मंगलवार, 9 अक्टूबर 2012

मित्रों कल मेरे काव्य संग्रह 'मचलते ख्वाब' और रश्मि प्रभा जी के संपादन में संपादित 'अनुगूंज' और 'खामोश खामोशी और हम' का विमोचन हुआ. आज विभिन्न समाचार पत्रों में उसकी विस्तृत खबर छपी....







शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012



प्रिय मित्रों,
नमस्कार।

काफी लम्बे अंतराल बाद आपसे मुखातिब हूं. दो बातें हैं जो आपसे साझा करनी हैं.
पहली ये कि रांची में 8 अक्टूबर को सायं 5 बजे विकास भारती सभागार में मेरे काव्य संग्रह मचलते ख्वाब का और दो अन्य कविता संग्रहों जिनमें मेरी भी कविताएं संकलित हैं, का विमोचन होगा. जिसकी अध्यक्षता करेंगे श्री हरिवंश जी प्रधान संपादक प्रभात खबर व मुख्य अतिथि होंगे मुख्य मंत्री श्री अर्जुन मुंडा जी. आप सभी मित्र आमंत्रित हैं. उसका कार्ड भी संलग्न है.....




दूसरी बात है कि वर्ष 2012 अब समाप्ति की ओर है. हम सभी ने अपने-अपने ब्लॉग पर तमाम कविताएं और कहानियां लिखी हैं. कुछ मित्रों की सलाह पर 2012 की इन रचनाओं को एक दस्तावेज के तौर पर संपादित करने की सहकारी योजना है इस तरह की एक पुस्तक कविता की होगी और एक कहानी की. इनका प्रकाशन 2013 में होगा फरवरी के अंत तक. इसलिए इन पुस्तकों का नाम होगा--कहानी ब्लॉग 2013 व कविता ब्लॉग 2013
इसमें 2012 में पोस्ट की गईं रचनाओं में से ही कुछ रचनाएं चुनी जाएंगी. इसमें शामिल होने के लिए रचनाएं आमंत्रित हैं. अपना मेल आई डी व ब्लॉग लिंक जरूर भेजिए....



सहयोग...

कहानी ब्लॉग--
3000 शब्द की कहानी के लिए-- 5000 रु.
5000 ....................................... 7500...
6500......................................... 9000...
8000 तक के शब्दों की कहानी.....12000...

कविता ब्लॉग--
5 रचनाएं.............6000 रु.
6 से 10 रचनाएं.....9000...
इसमें आपको 25 प्रतियां दी जाएंगी.

अगर आप पुस्तकों की इस योजना में शामिल होना चाहते हैं तो 31 अक्टूबर तक जरूर अवगत करा दें. हम आपसे बाद में सम्पर्क करेंगे.





शुक्रवार, 5 अगस्त 2011

बेबस मन..........वीना....

आजकल  
भागता है मन 
तुम्हारी तरफ
अधिकार नहीं रहा
स्वयं पर
प्रत्येक क्षण
मिलने की प्रबल इच्छा
तुम्हें देखने की चाहत
तुम्हारी बाहों में 
स्वयं को पाने का आभास
जानती हूं
सम्भव नहीं यह
जो सम्भव नहीं
मन क्यों भागता है 
उसी तरफ
क्यों चाहता है तोड़ना
सारे बंधन
क्यों चाहता है उड़ना
स्वच्छंद
गगन में
निश्चित रूप से
मन की डोर है
तुम्हारे हाथों में
तुम्हारे संग 
चल रही हूं
अनजानी डगर पर
अनजान पड़ाव की तरफ

बुधवार, 13 जुलाई 2011

पुस्तकें.............वीना....

ज्ञान का भंडार हैं
ये पुस्तकें
बंद है
हमारा भविष्य इनमें
नन्हें हाथों की शक्ति
आने वाले कल की 
तस्वीर है इनमें
इन्हें खोले और
गहराई में उतरे बिना
हम नहीं कर सकते
अपने कल का निर्माण
कल के
सवालों के उत्तर
मिलेंगे
यहां-वहां बिखरी
सजी किताबों में
लेकिन हमारे पास
समय कहां है
हम तो उलझे हैं
शार्ट कट में
किताबों के  लेन-देन से
पनपने वाले रिश्ते
सिमट गये हैं इंटरनेट में 
अब कोई नहीं मिलता
किताबों के बहाने
प्यार नहीं पनपता
पुस्तकालयों में
यादें नहीं सहेजी जातीं
सूखे फूलों में
नहीं रखी जाती
चिट्ठियां
अपनों के लिए
नहीं बनते फसाने
प्यार के
नहीं सजते सुर
संगीत के
क्योंकि
हम होते जा रहे हैं दूर
पढऩे की आदत से

रविवार, 19 जून 2011

तेरी बात.........वीना

घुटन भरी थी वो रात
जिसने छेड़ी तेरी बात


मन की यादों में सिमटे हैं
पल जो साथ बिताए रात


मरते दम तक साथ रहेगी
तेरी चाहत की सौगात


चंदा को भी तरसेगी अब
झिलमिल तारों की बारात


मन की प्यास बढ़ा जाएगी
जब-जब आएगी बरसात

सोमवार, 23 मई 2011

मेरे पापा.....................वीना



  • आज से 11 साल पहले 23 तारीख को ही पापा हम सबको
  •  रोता-बिलखता छोड़कर परमात्मा में लीन हो गए थे...मुझे 
  • हमेशा लगता रहा है वो आज भी मेरे पास हैं और मुझे हर 
  • मुसीबत से उन्होंने बचाया...तभी कहते हैं कि माता-पिता 
  • रहे या न रहें उनकी आत्मा हमेशा बच्चों के पास रहती है...
  • यह रचना पहले भी पोस्ट कर चुकी हूं आज फिर कर रही हूं...
  • काश फिर से मिल जाए...सच में कोई जिद नहीं करूंगी.....

तुम क्यों रूठ गए पापा
मैं निपट अकेली हो बैठी
किसे गुहारूं, किसे पुकारूं
मैं तो तन्हा हो बैठी


जब तुम थे तो बात और थी
एक आंसू न गिरने देते थे
अब रोते-रोते रात कटे
अश्कों का समंदर हो बैठी


पापा तुम क्यों छोड़ गए
न कोई पुकारे नाम मेरा
कोई न पूछे चाहत है क्या
चाहत सारी मैं खो बैठी


सिर पर तुम्हारा साया था
हर आफत से बचाते थे तुम
अब हर पल ही मैं तन्हा चलूं
बेगानों-सी हालत कर बैठी


बरगद बनकर खड़े थे तुम
बरखा-धूप खुद सहते थे
अब झुलसूं तपती गर्मी में
बारिश की बूंदें भिगो बैठीं


पापा तुम क्यों छोड़ गए
क्या नहीं जानते जग कैसा?
क्यों नहीं मुझे भी साथ लिया
जीवन मैं सब कुछ खो बैठी


एक बार आ जाओ मिलने को
कोई भी जिद न करूंगी कभी
हर कहना तुम्हारा मानूंगी
मैं अच्छी गुड़िया हो बैठी


अपने पास बुला लो मुझे
क्यों छोड़ा इस निर्दय जग में
पापा न कोई बन पाएगा
मैं अपनी किस्मत खो बैठी


हे: ईश्वर तू ये रीत बना
पिता से पहले बेटी उठे
न जग रौंदे न आंसू बहें
अब यही दुआ मैं कर बैठी





गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

अज्ञेय मन.........वीना

क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन सम्भवत: नहीं जानता
क्योंकि
जो भाता है
समय आने पर
वह नहीं भाता
भाने और न भाने के मध्य हैं
कुछ परिस्थितियां
जो आएंगी अवश्य
जिन्हें आना ही है
देश,काल,वातावरण की
शरीर की, आत्मा की
जिन्हें हमें
सहना ही है
जो देंगी
नई दिशा
हमारे भाने को
यही कारण है
प्रकृति का भी नियम है
'परिवर्तन' का
'परिवर्तन'
हर स्तर पर
आवश्यक नहीं
प्रत्येक परिवर्तन
हमें स्वीकार ही हो
फिर भी हम
ढलते जाते हैं
परिवर्तन में
और प्रतीक्षा करते हैं
अगले परिवर्तन की
जो नहीं भाता
फिर भी उसमें जीते हुए
जो भाता है
उसकी प्रतीक्षा में
गुजारते हैं
बाकी जीवन
ये भी आवश्यक नहीं
प्रत्येक भाने की स्थिति
स्थिर हो
जीवन पर्यन्त हो
न भाने की स्थिति
बन जाती है
भाने की विवशता
कारण...
समय और परिस्थितियां
क्योंकि मानव दास है
स्वामी नहीं
समय का
स्वामी होता
तो...
अपना भाना अवश्य जानता
न भाने को
भाना स्वीकार न करता
क्या भाता है
क्या नहीं भाता
मन...
सम्भवत:
जानना ही नहीं चाहता